पौष मास को लेकर लोगों में अनेक भ्रांतियां हैं। इस मास में मांगलिक
कार्यो का विधान न होने से लोग मान लेते हैं कि यह अत्यंत निकृष्ट मास है।
लोग मानते हैं कि यह शुभ कामों में नेष्ट (खराब) फल देता है, जबकि ऐसा नहीं
है। ऋषि-मुनियों ने पौष मास को सांसारिक कार्यो के लिए निषिद्ध सिर्फ
इसलिए किया था, ताकि लोग इस मास में इन कार्यो से अवकाश लेकर आध्यात्मिक
तरीके से आत्मोन्नति कर सकें और अपनी ऊर्जा को सक्रिय कर सकें।
पौष मास में अधिकांशत: सूर्य धनु राशि में रहता है। ज्योतिष शास्त्र में
धनु राशि का स्वामी बृहस्पति को माना गया है। मान्यता है कि देवताओं के
गुरुदेव बृहस्पति उनके परामर्शदाता होने के साथ-साथ मनुष्यों को भी
धर्म-सत्कर्म का ज्ञान देते हैं। ऋषियों ने सौर धनु मास को खर मास का नाम
इसलिए दिया ताकि लोग इसमें सांसारिक कामों शादी, गृह प्रवेश आदि से मुक्त
रहकर इस मास का उपयोग अपने आध्यात्मिक लाभ के लिए कर सके। अपने लिए तो
इंसान सब कुछ करता है, लेकिन परहित के लिए भी वह काम करे। आत्मोन्नति के
लिए सत्संग, तीर्थाटन, स्वाध्याय, ग्रंथों का अध्ययन और जरूरतमंदों की सेवा
कर सके। देवगुरु बृहस्पति की राशि धनु में आत्मा कारक सूर्य की स्थिति
जप-तप, पूजा-पाठ, ध्यान-योगाभ्यास के लिए प्रेरणादायक होती है। हम इस अवधि
में आध्यात्मिक साधना करके चंचल मन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार, इस कालखंड में प्राकृतिक ऊर्जा इंद्रिय-निग्रह में
सहायक होती है। चित्त सांसारिक वैराग्य की ओर सहज ही उन्मुख हो उठता है।
वैराग्य के लिए स्वांग रचने की आवश्यकता नहीं। वैरागी बनने का ढोंग करना ही
मिथ्याचार है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण एक श्लोक में कहते हैं कि जो
पुरुष कर्र्मेद्रियों को हठ से रोककर इंद्रियों के भोगों का मन से चिंतन
करता रहता है, वह मिथ्याचारी है। वस्तुत: वैराग्य का तात्पर्य संसार को
छोड़कर सिर मुड़ाना या जोगिया कपड़े पहनना नहीं है, बल्कि वैराग्य का
वास्तविक अभिप्राय संसार में रहकर गृहस्थ जीवन के कर्तव्य का पालन करते हुए
दुष्कर्र्मो और पाखंड से विरक्ति है। वैराग्य संयम की शक्ति से पोषित होता
है, लेकिन आज समाज में आत्म संयम का अभाव दिख रहा है। मन पर विवेक का
अंकुश होने पर ही व्यक्ति संयमी हो सकता है। धनु मास में हम आध्यात्मिक
ऊर्जा को अपने में उतार सकते हैं।
रोज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में हमारी ऊर्जा का क्षरण होता रहता है। यह
जानते हुए भी हम सांसारिक भोगों के आकर्षण से बच नहीं पाते। पौष मास हमें
संयमी बनाकर आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय का सुअवसर प्रदान करता है। ऐसे
उपयोगी कालखंड को खर मास कहकर इसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है। सूर्य के
तेज और देवगुरु की दिव्यता से संपन्न पौष मास आध्यात्मिक रूप से समृद्धि
दायक है।
