बुधवार, 5 दिसंबर 2012

संगम की रेती पर चौकड़ी भर रहे अखाड़ों के अश्व


इलाहाबाद। संगम की धरती पर शनिवार की सुबह घोड़ों को चौकड़ी भरते देख रामायण और महाभारत के उद्धृत वर्णन का स्मरण हो आया। गेरुआ वस्त्र में तीन कम आयु के संत उन पर सवार हवा से बातें कर रहे थे। शनिवार तड़के चाबुक पड़ते ही घोड़े रेत उड़ाते सरपट दौड़ पड़े। देखते ही देखते जूना अखाड़े की जमीन का चक्कर लगाकर रुक गए। इसके बाद अश्वों के साथ तीनों युवा संत गंगा की तरफ बढ़े और वहां गंगा जल का आचमन किया। 

देखने वालों को लगा कि संत अश्वों के साथ अपना मनोरंजन कर रहे हैं, लेकिन वे परंपरा को अंजाम देने में लगे थे। अश्वों की पीठ से जब तीनों संत नीचे उतरे तो उनके मुख की चमक देखते ही बनती थी। अश्वों के साथ सैर की बात छिड़ी तो वे गंभीर हो उठे। ये तीनों जूना अखाड़े के संत थे। संत पशुपति गिरि ने बताया कि वे कोई सैर नहीं कर रहे थे, वे एक पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहे थे। शास्त्रों में विदित है कि किसी भी शुभ कार्य में अश्व और गज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे में अश्वों को शुद्ध मानते हुए उनके द्वारा अखाड़े की जमीन की परिक्त्रमा कराने की परंपरा है, उसी को आज संपन्न किया गया। अखाड़े में हाथी भी है। गजराज को गणेश भगवान मानते हैं और उन्हें भी अश्वों के साथ हर सुबह अखाड़े की भूमि पर घुमाया जाता है। यह प्रक्त्रिया भूमि पूजन तक चलती रहेगी। 

 
दैनिक जागरण