सोमवार, 14 जनवरी 2013

महाकुंभ एक दृष्टि में

मकर संक्रांति (शाही स्नान) 

14.जनवरी 2001 को एक करोड़ श्रद्धालु थे। इस बार 110 लाख का अनुमान है।

2001 में 1495.31 हेक्टेयर, 2007 अर्धकुंभ में 1613.80 हेक्टेयर व इस बार के कुंभ में 1936.56 हेक्टेयर में मेला क्षेत्र बसाया गया है।

2001 कुंभ में मेला क्षेत्र 11 सेक्टर में विभक्त था। 2007 अर्धकुंभ में भी इतने ही सेक्टर थे। इस बार सेक्टर संख्या 14 है।

2001 में 35, 2007 में 44 पार्किंग स्थल थे, इस बार 99 प्वाइंट बनाए गए हैं।

2001 में 28 पुलिस स्टेशन बनाए गए थे, 2007 में भी इतनी संख्या थी। इस बार 30 पुलिस स्टेशन स्थापित किए गए हैं।

2001 में 9965, 2007 में 10913 व इस बार 12461 पुलिस कार्मिक लगाए गए।

2001 में एक भी सीसी कैमरा नहीं लगाया गया था, 2007 में 19 कैमरे लगाए गए थे जबकि इस बार इनकी संख्या 85 है।

कुंभ मेला 2001-44 दिनों के लिए आयोजित था, जबकि कुंभ 2013 कुल 55 दिनों के लिए होगा।

पौष पूर्णिमा 9.जनवरी 2001 को 50 लाख श्रद्धालु थे। इस बार 55 लाख का अनुमान है।

मौनी अमावस्या (शाही स्नान) 24.जनवरी 2001 को 276 लाख श्रद्धालु थे। इस बार तीन करोड़ का अनुमान है।

बसन्त पंचमी (शाही स्नान) 29जनवरी 2001 को 175 लाख श्रद्धालु थे। इस बार 193 लाख का अनुमान

माघी पूर्णिमा 8.फरवरी 2001 को 150 लाख श्रद्धालु थे। इस बार 165 लाख का अनुमान है।

महाशिवरात्रि 21.फरवरी 2001 को 50 लाख श्रद्धालु थे। इस बार 55 लाख का अनुमान है।


लाखों लोगों ने संगम में लगायी डुबकी

इलाहाबाद: इलाहाबाद में ‘महाकुंभ’ के पहले दिन आज नगा साधुओं, अन्य साधुओं और संतों के अलावा लाखों की संख्या में लोगों ने गंगा, यमुना और सरस्वती (अब लुप्त हो चुकी हैं) के संगम में स्नान किया.

मकर संक्राति के अवसर पर आज सूर्योदय होने के साथ ही भारी संख्या में ‘महानिर्वाणी अखाडा’ और ‘अटल अखाडा’ के साधुओं तथा नाग साधुओं का ‘शाही स्नान’ आरंभ हो गया. ‘शाही स्नान’ का नजारा देखने लायक था. एक ओर बडी संख्या में लंगोट पहने या फिर निर्वस्त्र भस्म लपेटे नगा साधु संगम की ओर बढ रहे थे तो दूसरी ओर विभिन्न अखाडों और अन्य साधु समुदायों के ‘महामंडलेश्वरों’ धर्मगुरुओं की सजी संवरी पालकियां चल रही थीं. कुछ सजे-धजे हाथियों पर सवार थे तो कुछ ने घोडों की सवारी की.

नगा साधुओं के शरीर पर जहां गेंदे के फूलों और रुद्राक्ष की मालाएं नजर आ रही थीं वहीं दूसरी ओर अन्य साधुओं ने सोने के मुकुट और अन्य गहने पहने हुए थे. हजारों की संख्या में आम लोग और विदेशी ‘शाही स्नान’ को देखने आए थे. भारत की विविधता में एकता का यह संगम बहुत ही सुन्दर था. संगम पर पहुंचकर सभी साधुओं ने अपने पारंपरिक अस्त्रों जैसे त्रिशूल, धनुष और तलवारों की पूजा की और फिर स्नान से पहले अपने इष्ट की पूजा की. ‘महानिर्वाणी अखाडा’ और ‘अटल अखाडा’ के बाद 11 अन्य अखाडों का जुलूस निकला. सभी अखाडों को उनमें शामिल लोगों की संख्या के आधार पर आधे घंटे से एक घंटे का समय दिया गया था. 

इन अखाडों की स्थापना आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा और प्रचार के लिए की थी. समय के साथ-साथ इन अखाडों की संख्या में वृद्धि होने लगी और हर 12 वर्ष के बाद आयोजित होने वाले ‘महाकुंभ’ में इनकी भूमिका निर्णायक होती है. ‘शाही स्नान’ के जुलूस में सबसे बेमेल बात रही द्वारका पीठ और ज्योर्तिपीठ के शंकराचार्यों का भाग ना लेना. इलाहाबाद में ‘महाकुंभ’ का आयोजन द्वारका पीठ के शंकराचार्य और ज्योर्तिपीठ बद्रीकाश्रम स्वामी स्वरुपानंद के नियंत्रण क्षेत्र में हो रहा है. 

मेला में मौजूद ज्योर्तिपीठ बद्रीकाश्रम के शंकराचार्य के करीबी सहयोगी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया, ‘‘स्वामी स्वरुपानंद ने देश में उग आए स्वयंभू संतों से शंकराचार्य को अलग करने के लिए आदि शंकराचार्य के नियमानुसार चारों पीठों के लिए चतुष्पथ बनाने की मांग की थी. लेकिन प्रशासन ने अनुरोध को नई परंपरा आरंभ करने तुल्य बताते हुए अस्वीकार कर दिया.’’ इलाहाबाद के डिवीजनल आयुक्त देवेश चतुर्वेदी ने बताया कि आज संगम में 80 लाख से ज्यादा लोगों ने स्नान किया. अभी भी बडी संख्या में लोग संक्रांति के स्नान के लिए आ रहे है और इसके देर रात तक चलने की संभावना है अधिकारियों के अनुसार पूरे मेले में कहीं से भी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है.